हिंदी के प्रति लोगों में क्यों घट रहा है उत्साह

  • Posted on: 26 December 2012
  • By: admin

आपने टीवी पर क्रिकेट मैच देखते हुए हिंदी में कमेंट्री तो सुनी ही होगी। वह विज्ञापन भी जरूर देखा-सुना होगा जिसमें कहा गया है, जो बात हिंदी में है, वह किसी में नहीं। जिन लोगों ने नहीं देखा है, उनके लिए बताते चलें कि विज्ञापन में ऑस्ट्रेलिया के पूर्व गेंदबाज शेन वार्न यह बात कह रहे हैं। विज्ञापन में यह कहने से पहले उन्हें किताब से हिंदी पढ़कर हिंदी सीखने की सलाह देते हुए भी दिखाया गया है। कह सकते हैं कि क्रिकेट कमेंट्री में अंग्रेजी के मुकाबले में नदारद रहने वाली हिंदी अपनी जगह बनाने में कामयाब हो रही है। खुद अंग्रेजी बोलने वाला खिलाड़ी न सिर्फ हिंदी बोल रहा है, बल्कि पढ़ भी रहा है।
कहा यह भी जा सकता है कि हिंदी को बाजार में तवज्जो मिल रही है, लेकिन इन सबके बीच चिंताजनक पहलू यह है कि हिंदी बोलने वाली आबादी का अपनी भाषा को लेकर उत्साह सिमट गया है। हिंदी भाषी लोगों में अंग्रेजी न जानने का अफसोस दिन-प्रतिदिन गहरा होता जा रहा है। बात यहां तक आ पहुंची है हिंदी भाषी क्षेत्रों की एक बड़ी आबादी हिंदी की किताबों और इस विषय के पठन-पाठन से पीछे हट गई है या हटने की प्रक्रिया में है। उत्तर प्रदेश को ही लीजिए। हिंदी पट्टी के इस हिस्से में विषय के तौर पर हिंदी का पठन-पाठन दयनीय हो गया है।
उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद बोर्ड के शैक्षणिक सत्र 2011 के हाईस्कूल नतीजों में सिर्फ हिंदी विषय में सवा तीन लाख बच्चे फेल हुए हैं। कंपार्टमेंट परीक्षा के जरिये दोबारा मौका पाने वाले साढ़े चार सौ बच्चों में से 59 दोबारा फेल हो गए। ऐसे में जो लोग हिंदी के विकास को लेकर राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन करने के लिए लालायित रहते हैं, वे विषय के तौर पर हिंदी की दशा-दुर्दशा को लेकर सवाल क्यों नहीं उठाते हैं? हिंदी के खिलाफ संस्थागत सहमति अंग्रेजी भाषी खिलाड़ी जब अंग्रेजी की ही टोन में हिंदी का एक वाक्य बोलता है, तो बाजार और विज्ञापन में हिंदी आने से एक खुशनुमा नजारा बनता है।                    -नवीन शर्मा

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