रेल रोको कितना उचित?

  • Posted on: 9 August 2012
  • By: admin

सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार से सवाल किया है कि रेल रोको, चक्का जाम व सड़कों को जाम करने जैसे आंदोलनों के दौरान यदि सरकारी सम्पत्ति को नुकसान होता है तो वर्तमान कानूनी प्रावधानों के तहत क्या संबंधित राजनीतिक दलों या अन्य संगठनों की मान्यता रद्द की जा सकती है? कुछ माह पूर्व उत्तरप्रदेश व हरियाणा में जाट और गुर्जर आंदोलनों के दौरान बड़े पैमाने पर रेलवे की सम्पत्ति को नुकसान पहुँचाया गया था और कई दिनों तक रेल यातायात को ठप कर दिया गया था। भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में राजनीतिक दल व अन्य संगठन रेल व सड़क यातायात जाम करके अपनी बात मनवाने की कोशिश करते हैं। सरकारी सम्पत्ति को नुकसान पहुँचाने, रेल व सड़क यातायात को ठप करने के सवाल पर पूर्व पुलिस अधिकारी प्रकाशसिंह द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान सालिसिटर जनरल रोहिन्टन नरीमन ने कहा कि इस समस्या से निपटने के लिए सरकार द्वारा उठाए गए कदमों की उच्च न्यायालय समीक्षा कर दिशा-निर्देश दे सकता है। बंद, सड़क जाम या रेल रोको जैसे आंदोलनों के दौरान भीड़ हिंसक हो जाती है, जिसकी वजह से बड़े पैमाने पर जान-माल का नुकसान होता है। गुर्जर व जाट आंदोलनों के दौरान न हर तरह की गतिविधियाँ ठप हुई। देश के सभी राजनीतिक दलों को सर्वदलीय बैठक बुलाकर निर्णय लेना चाहिए कि वे बंद, रेल रोको व सड़क जाम जैसे तरीकों का इस्तेमाल कर विरोध-प्रदर्शन नहीं करेंगे। वास्तविकता यह है कि आंदोलन व विरोध-प्रदर्शन के इस अनुचित रूप को राजनीतिक दलों ने ही आगे बढ़ाया है। जाट और गुज्जर आंदोलन के नेताओं ने राजनीतिक दलों द्वारा बताए गए रास्ते को अपनाकर ही अपनी माँगों को मनवाने की कोशिश की थी। इन आंदोलनों के दौरान रेल की पटरियाँ उखाड़ी गईं लेकिन सरकारें अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी का निर्वहन करने में बुरी तरफ विफल हुई थीं। नगालैंड के कुछ संगठनों ने तो कई महीनों तक राष्ट्रीय राजमार्ग को जाम करके मणिपुर को जरूरी वस्तुओं की आपूर्ति बंद कर दी थी। जबकि ऐसे आंदोलनों से सख्ती से निपटने के लिए राष्ट्रीय नीति बनाने की जरूरत है। दुर्भाग्य की बात यह है कि सरकार व विपक्ष के बीच चल रही चिरन्तन खटपट की वजह से दोनों के बीच किसी मुद्दे पर सार्थक विचार-विमर्श की गुंजाइश भी नहीं बची है। इसलिए आम आदमी के पास न्यायालय की शरण में जाने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं है। उम्मीद की जानी चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में आम आदमी को राहत देगा।                                     -नवीन शर्मा

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