राष्ट्रपति से अपेक्षाएं

  • Posted on: 21 August 2012
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राष्ट्रपति पद की शपथ ग्रहण में प्रणब मुखर्जी ने निराश किया। आशा की जा रही थी कि वह राष्ट्रपति पद की शपथ अपनी मातृभाषा अथवा राष्ट्रभाषा में लेंगे, पर उन्होंने उस भाषा में शपथ ग्रहण की जिसमें हमारे देश की गुलामी का आदेश दिया गया था। आम दिनों में कोई नेता, अधिकारी अथवा नागरिक किसी भी भाषा का प्रयोग करे, उसका महत्व कम है पर जब राष्ट्रपति पद की शपथ ग्रहण जैसा राष्ट्रीय समारोह हो, तब अपने देश की भाषाओं को नकारकर गुलामी की प्रतीक भाषा को कंठहार बनाना करोड़ों भारतीयों को कितनी पीड़ा दे गया इसका अनुमान संभवत: संसद के केंद्रीय हाल में बैठे नेता और स्वयं राष्ट्रपति भी नहीं लगा पाए। राष्ट्रपति ने शपथ लेने के बाद जो प्रथम भाषण दिया उसमें लेडीज एंड जेंटलमैन अर्थात औरतों और भद्रपुरुषों कहकर अपने देशवासियों को संबोधित किया। प्रश्न यह है कि क्या हम देशवासी अपने राष्ट्रपति के लिए केवल औरत और पुरुष ही हैं? क्या उनका अपने देशवासियों से इससे ज्यादा कोई रिश्ता नहीं। जब हम अपने देश को भारत माता कहते हैं तो सारे भारत की संतान स्वयंमेव ही एक पवित्र रिश्ते में बंध जाती हैं। कितना अच्छा होता कि भारत के बंगाल प्रांत का पुत्र प्रणब अपने ही पूर्वज स्वामी विवेकानंद से यह सीख लेता कि भारत के ऐसे कौन से दो-चार शब्द हैं जो पूरी दुनिया को प्रेम के धागे में सदा-सदा के लिए पिरो लेते हैं। यह प्रसन्नता का विषय है कि भारत के प्रथम नागरिक ने अपने प्रथम भाषण में यह कहा कि भूख से बड़ा अभिशाप कोई नहीं। देर से ही सही, उन्होंने भूख की पीड़ा को, भीषणता को महसूस किया। प्रणब के प्रथम नागरिक बनने से कुछ सप्ताह पहले ही महाराष्ट्र सरकार ने सन 2011-12 में कुपोषण से मरने वाले बच्चों के आंकड़े जारी किए। इस वर्ष केवल महाराष्ट्र में ही 24,365 बच्चे कुपोषण के कारण मौत के मुंह में चले गए और दस लाख से ज्यादा अभी कुपोषित और कमजोर हैं। पर प्रश्न यह है कि एक प्रांत की यह दुरावस्था है तो दूसरे सभी प्रांतों की वास्तविकता कितनी डरावनी होगी। एक सच और भी है, जिसने अनेक प्रश्न उत्पन्न किए। पदभार संभालने से पहले बड़ी विनम्रता के साथ प्रणब मुखर्जी ने राष्ट्रपिता की समाधि पर नमन किया। उसके पश्चात अपनी राजनीतिक गुरु इंदिरा गांधी की समाधि पर पुष्पांजलि अर्पित की। राजीव गांधी की वीर भूमि में भी प्रणाम किया। सवाल यह है कि क्या अन्य प्रधानमंत्री नमन के योग्य नहीं थे? कम से कम लाल बहादुर शास्त्री से एक पाठ तो सीखा ही जा सकता था। देश में अनाज की कमी और भूख को महसूस करते हुए उन्होंने सोमवार के दिन एक समय अन्न त्याग करने की बात कही थी। उन्होंने स्वयं यह व्रत रखा, जिसका अनुसरण पूरे देश ने किया। कितना अच्छा होता अगर प्रणब दा शास्त्रीजी की समाधि पर जाकर यह संकल्प ही कर लेते कि जब तक देश के बच्चे भूख और कुपोषण से मौत के मुंह में जा रहे हैं, वह भी शास्त्रीजी जैसा कोई व्रत लेकर देश को उसी दिशा में अग्रसर करेंगे। इतना ही कह देते कि जब तक देश में सूखा और बिजली का संकट है तब तक वह स्वयं कम बिजली का प्रयोग राष्ट्रपति भवन में करेंगे और केवल सजावट के लिए पानी के फव्वारे और बिजली की रोशनी नहीं करवाएंगे। पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। देश यह आशा रखता है कि राष्ट्रपति भवन में वैसा ही सात्विक राष्ट्रीय वातावरण रहेगा जैसा डॉ. राजेंद्र प्रसाद के राष्ट्रपति काल में था और वैसे ही व्रत प्रारंभ होंगे जैसे लाल बहादुर शास्त्री ने लिए। आशा यह भी है कि महात्मा गांधी को नमन करने के बाद पदभार ग्रहण करने वाले हमारे राष्ट्रपति उसी जीवनशैली को अपनाएंगे जो महात्मा गांधी ने अपने जीवन में उतारी और राष्ट्र को सौंपी। कितना अच्छा हो कि अब प्रणब दा अर्थात बड़े भाई देशवासियों को भविष्य में भाई-बहन का प्यारा सा संबोधन दें। याद रखना होगा कि भाइयो और बहनो तथा औरतो और आदमियो संबोधन में उतना ही अंतर है जितना शरीर और आत्मा में।

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