मोबाइल की भीड़ में

  • Posted on: 26 February 2013
  • By: admin

बढ़ती आबादी भारत जैसे देशों की समस्या है। दुनिया के कई देशों, खासकर पश्चिम के लिए यह कोई बहुत बड़ी समस्या नहीं है। जापान जैसे देशों में तो मृत्यु दर और जन्म दर, दोनों ही तेजी से घट रही हैं। वहां समस्या यह है कि बूढ़ों की संख्या बहुत ज्यादा है और बच्चों की संख्या बहुत कम। पश्चिमी देशों में स्थिति इतनी बुरी नहीं है, लेकिन हालात इसी तरफ बढ़ रहे हैं। एशिया और अफ्रीका के ज्यादातर देश ही हैं, जो आबादी बढऩे से परेशान हैं और इस पर नियंत्रण के लिए अपने बहुत-से संसाधन और अपनी बहुत-सी ऊर्जा खर्च करते हैं। और इन्हीं देशों की वजह से पूरी दुनिया की कुल जमा आबादी भी बढ़ रही है। लेकिन एक चीज है, जो बढ़ती आबादी के इन आंकड़ों को मात देने जा रही है। वह चीज है, मोबाइल फोन की संख्या। इंसान की आबादी और मोबाइल फोन की संख्या का अंतर बहुत तेजी से घट रहा है। ताजा आंकड़े बताते हैं कि आबादी की तुलना में मोबाइल फोन की संख्या 87 फीसदी तक पहुंच गई है। अनुमान है कि इस साल के अंत तक दुनिया में मानव आबादी से ज्यादा मोबाइल फोन होंगे। और सन 2017 तक तो इनकी संख्या मानव आबादी की 140 फीसदी होगी। यानी औसतन पांच लोगों के परिवार के पास कम से कम सात मोबाइल फोन तो होंगे ही। दिलचस्प बात यह है कि दुनिया में सबसे ज्यादा मोबाइल फोन चीन में हैं और उसके बाद भारत का नंबर आता है। अमेरिका इस मामले में तीसरे नंबर पर है। हमारे देश के ताजा आंकड़े बताते हैं कि देश में इस समय 89 करोड़ से भी ज्यादा सक्रिय मोबाइल फोन हैं, जबकि देश की आबादी 1.26 अरब के आस-पास है। यानी औसत के हिसाब से हम यह मान सकते हैं कि देश में जितने भी वयस्क लोग हैं, उनमें से ज्यादातर के पास मोबाइल फोन है। पर क्या वास्तव में ऐसा है? हमें पता है कि यह सच नहीं है। देश में अब भी दूर-दराज के बहुत से इलाके ऐसे हैं, जहां मोबाइल फोन के सिग्नल नहीं पहुंचते। इन इलाकों की आबादी कितनी भी कम क्यों न हो, पर उनके लिए अब भी मोबाइल फोन रखने का कोई अर्थ नहीं है। यह सच है कि मोबाइल फोन की तकनीक पिछले कुछ साल में काफी तेजी से सस्ती हुई है, जिसकी वजह से बहुत गरीब लोगों के हाथों में भी मोबाइल फोन पहुंच गए हैं।
मोबाइल फोन अब शहरी ही नहीं, ग्रामीण जीवन का भी एक जरूरी हिस्सा बन गए हैं। लेकिन ये अभी इतने भी सस्ते नहीं हुए कि गरीबी की रेखा के नीचे जीने वाले करोड़ों परिवारों के सभी वयस्क सदस्यों के हाथों में ये पहुंच सकें। यह जरूर है कि आपको शहरों और कस्बों में ऐसे लोग मिल जाएंगे, जो एक से ज्यादा फोन रखते हैं और इनकी वजह से ही औसत गड़बड़ा जाता है। इसे हम मोबाइल फोन की विषमता या गैर-बराबरी भी कह सकते हैं (कंप्यूटर और इंटरनेट के मामले में इसे डिजिटल डिवाइड भी कहा जाता है)- यानी एक तरफ ऐसे लोग हैं, जिनके पास एक से ज्यादा मोबाइल फोन हैं और दूसरी तरफ, ऐसे लोग हैं, जिनके लिए मोबाइल फोन अब भी एक सपना बना हुआ है। यह हालत कम या ज्यादा दुनिया के उन सभी देशों की है, जिन्हें हम विकासशील देश कहते हैं और जो अभी मानव आबादी को नियंत्रित करने की समस्या से जूझ रहे हैं। कल्याणकारी राज्य की अपनी परंपरागत परिकल्पना में हम लोगों को भोजन और शिक्षा जैसे अधिकार देकर उनके सशक्तीकरण की कोशिश करते हैं। इस फेहरिस्त में अब मोबाइल फोन को जोडऩे का भी वक्त आ गया है। लोगों को पूरी दुनिया की मुख्यधारा से जोडऩा भी उनके सशक्तीकरण का ही एक हिस्सा है, और मोबाइल फोन इसी का औजार है।                 -नवीन शर्मा

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