पहचान के नंबर में बदलने के अर्थ

  • Posted on: 1 October 2012
  • By: admin

पिछले कई महीनों से हमारे आस-पास के किसी बैंक में कुछ लोग लाइन में लगे होते हैं। मशीनों के साथ बैठे कुछ लोग उनके फिंगर प्रिंट और आंखों की रेटिना की तस्वीरें ले रहे होते हैं। जिनके फिंगर प्रिंट और रेटिना की तस्वीरों को मशीन क्लियर कर देती है, वे खुश। जिनकी पहचान फेल हो जाती है, वे कई बार के प्रयास के बाद भी उदास लौट रहे होते हैं। यहां भारतीय राज्य और राज्य निर्धारित जनतंत्र का एक उत्सव चल रहा होता है। यह उत्सव है, 'आधार कार्ड बनने का।Ó आधार कार्ड भारत में सूचना प्रौद्योगिकी के अगुआ नंदन नीलेकणि के नेतृत्व में भारत सरकार के एक आदेश के तहत बनी स्वायत्त संस्था के जरिये बनाया जा रहा है। लोगों को लगता है कि इसके होने से हमें भारतीय राज्य की कल्याणकारी योजनाओं के तहत मिलने वाली अनेक सुविधाएं मिल पाएंगी। आधार कार्ड हमारे बॉयोमेट्रिक पहचान पर आधारित हमें एक नंबर देता है, जो राष्ट्र निर्धारित हमारी अस्मिता का हिस्सा बन जाएगा। इस नंबर से देश-दुनिया के किसी भी हिस्से में हमारी पहचान की तस्दीक की जा सकेगी। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि पहचान को नंबर देने की परंपरा औपनिवेशिक गवर्नेंस की पद्धति रही है, जिसके तहत सैनिक, कैदी, रिफ्यूजी और श्रमिक प्रवासियों को एक विशेष नंबर दिया जाता रहा है। लेकिन अमेरिका ने इसे 'सोशल सिक्योरिटी नंबरÓ का रूप देकर इसकी पूरी अवधारणा को बदल दिया। अमेरिका की तरह ही इसे अब भारत में भी अपनाया जा रहा है। इसे नागरिकता की पहचान का रूप दिया जा रहा है। जो पद्धति पहले सीमांत पर बसे समूहों को विभिन्न कारणों से पहचानने की रही है, वही पद्धति अब हम सबके लिए अपनाई जा रही है। भारत ही नहीं, दुनिया के कई दूसरे देश भी इस दिशा में बढ़ रहे हैं। अमेरिका की तरह ही भारतीय राज्य का भी तर्क है कि इसे भारतीय राज्य की कल्याणकारी योजनाओं के तहत मिलने वाली सुविधाओं, जैसे घर, पेंशन, गरीबों को सब्सिडी के रूप में दी जानी वाली रकम के सीधे नकद ट्रांसफर, रेल टिकट लेने या बैंक खाता वगैरह खोलने के लिए इस्तेमाल किया जा सकेगा। इसके नियोजकों का मानना है कि यह एक ऐसा नंबर होगा, जिसके आधार पर भारतीय राज्य के साथ हमारा वैध संबंध स्थापित हो जाएगा। यह नंबर प्रवासियों को उनके  घर बैठे ही राज्य प्रायोजित सुविधाएं, सम्मान और वैधता देने में प्रशासन की मदद करेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह राज्य द्वारा गरीबों को 'इंडिविजुअलÓ के रूप में मान्यता देने की एक प्रक्रिया है, जिससे उनकी समस्याओं के समाधान की इकाई पहले की तरह घर या  समुदाय न होकर व्यक्ति हो जाएगी। 'हाउस होल्डÓ एवं 'कम्युनिटीÓ को इकाई मानकर राज्य द्वारा चलाई जाने वाली योजनाओं से कई के वंचित रह जाने का डर रहता है। ऐसा माना जा रहा है कि आधार कार्ड के तहत व्यक्ति को इकाई बना देने पर शायद ही अब कोई छूटे। इससे ई-गवर्नेस मजबूत होगा और उपभोक्ताओं के बीच उत्पादों के वितरण का काम आसान होगा। इससे गरीबों के साथ मध्य वर्ग का जीवन भी आसान होगा। बाजार अपने ग्राहकों के और ग्राहक बाजार कीनजरों में सीधे होगा। लेकिन इसके आलोचकों की कई शंकाएं हैं। उनका मानना है कि यह भारतीय राज्य द्वारा आरंभ की गई एक निगरानी प्रणाली है, जिसे कल्याणकारी योजनाओं के प्रसार की तकनीकी सुविधा के रूप में पेश किया गया है। निगरानी से प्राप्त सूचनाओं का राज्य अपने लोगों को नियंत्रित करने के लिए इस्तेमाल करता है। उनका यह भी मानना है कि यह बाजार उत्पादित 'कॉरपोरेट इलीटÓ के प्रभाव में शुरू किया गया है। आलोचकों का मानना है कि इसके माध्यम से राज्य हमारी निजता को भी प्रशासित करने की कोशिश कर रहा है। इसमें सूचनाएं सरकार द्वारा नहीं, बल्कि एक स्वायत्त संस्था द्वारा इक_ी की जा रही हैं, जो किसी भी विदेशी एजेंसी या कॉरपोरेट सेक्टर तक पहुंच सकती हैं।                           -नवीन शर्मा

Category: