जानलेवा जाड़ा

  • Posted on: 18 January 2013
  • By: admin

ज्यादातर भारतीय इस मायने में खुशनसीब हैं कि उन्हें मौसम की विविधताएं देखने को मिलती हैं। अन्यथा दुनिया में ऐसे कम ही इलाके हैं, जहां हर मौसम का मजा लिया जा सके। हर मौसम अपने रौद्र रूप में भी सुंदर होता है, बशर्ते उसकी मार से लोगों को बचाने का इंतजाम हो। भारत के ज्यादातर हिस्सों में यूरोप जैसी ठंड नहीं पड़ती, लेकिन हमारे यहां जब हिमालय पर्वत शृंखला में बर्फ गिरती है और मैदानी इलाकों में शीतलहर चलती है तो देश के विभिन्न इलाकों में सर्दी की ठिठुरन से होने वाली मौतों के आंकड़े आने लगते हैं। हालांकि मौसम चक्र में आ रहे बदलाव के चलते इस साल सर्दी देरी से शुरू हुई है, लेकिन इस शुरुआती दौर में ही सर्दी के सितम से लोगों के मौतों की खबरें आने लगी हैं। सर्दी सिर्फ पहाड़ों और गंगा-यमुना के मैदानों तक ही सीमित नहीं है, रेगिस्तानी राजस्थान और मध्यप्रदेश तक ठंड से ठिठुर रहे हैं। कितने लोगों को मौसम की मार से बचाने के लिए सहारे या आसरे की जरूरत है, राज्य सरकारों के पास न तो इसके ठीक-ठीक आंकड़े हैं, न ही समस्या पर काबू पाने की कोई कारगर रणनीति। दरअसल शहरी और अर्द्धशहरी इलाकों में मौसम की मार से लोगों की मौत होने की बड़ी वजह है शहरी नियोजन में सरकारी तंत्र की अदूरदर्शिता। जब से आवासीय कॉलोनियों की बसाहट के मामले में विकास प्राधिकरणों और गृह निर्माण मंडलों के बजाय निजी भवन निर्माताओं का दखल बढ़ा है, तब से रोज कमाकर रोज खाने वालों और बेघर लोगों के लिए आवासीय योजनाएं हाशिए पर खिसकती गई हैं। करोड़ों लोग फुटपाथों, रेलवे स्टेशनों और बस अड्डों पर या टाट और प्लास्टिक आदि से बनी झोपडिय़ों में रात बिताते हैं। बहुत से लोगों के पास गरम कपड़े या रजाई-कंबल तो दूर, तापने को लकडिय़ां तक उपलब्ध नहीं होती हैं। ऐसे लोगों को मौसम की मार से बचाने के लिए अदालतें भी हर साल सरकारों और स्थानीय निकायों को लताड़ लगाती हैं, लेकिन सरकारी तंत्र पर उसका कोई असर नहीं होता। आखिर राज्य सरकारें इस मामले को कब अपने अहम सरोकारों में शामिल कर सर्दी के सितम से लोगों की मौतों के सालाना सिलसिले को थामेंगी?                 नवीन शर्मा

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