अधूरे सुधारों का सच

  • Posted on: 30 April 2012
  • By: poonam

वित्त मंत्रालय के मुख्य आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु ने अमेरिका यात्रा के दौरान जिस तरह भारत में आर्थिक सुधारों की धीमी रफ्तार पर चिंता जताई और इसके लिए गठबंधन राजनीति और घपलों-घोटालों को मुख्य रूप से जिम्मेदार बताते हुए कम से कम 2014 तक यही स्थिति कायम रहने का अंदेशा जताया उससे यह एक बार फिर स्पष्ट हो गया कि संप्रग सरकार अपने गठबंधन के सहयोगियों के समक्ष इस हद तक नतमस्तक हो गई है कि उसने राष्ट्रीय हितों को भी हाशिये पर रख दिया है। कौशिक ने वाशिंगटन के प्रतिष्ठित कारनेगी संस्थान में जो कुछ कहा उसके बाद अंतरराष्ट्रीय उद्योग-व्यापार जगत को भी यह स्पष्ट संदेश चला गया कि भारत सरकार ने जरूरी आर्थिक सुधारों को ठंडे बस्ते में डाल दिया है। हालांकि कौशिक बसु ने अपने बयान को निजी विचार बताकर मामले को ठंडा करने की कोशिश की, लेकिन इससे बात बनने वाली नहीं है, क्योंकि यह तथ्य है कि वह वित्त मंत्रालय के मुख्य आर्थिक सलाहकार हैं। उनके विचार निजी हों या सरकारी, उनका महत्व एक जैसा है। यह पहली बार नहीं है जब सरकार के स्तर पर गठबंधन की मजबूरियों को स्वीकार किया गया हो। संप्रग सरकार के दूसरे कार्यकाल के दौरान एक नहीं अनेक बार स्पष्ट हो चुका है कि सत्तारूढ़ गठबंधन में शामिल कुछ दलों की अड़ंगेबाजी के चलते केंद्र सरकार का संचालन सही तरह नहीं हो पा रहा है। कौशिक बसु ने अपनी सफाई में यह भी कहा है कि वह तो 2014 में यूरोप के संभावित आर्थिक संकट का जिक्र कर रहे थे, लेकिन इससे तो आर्थिक मोर्चे पर भारत की चुनौती और अधिक बढ़ जाती है। कर्ज संकट के चलते 2014 में यूरोप में जैसे आर्थिक भूचाल की आशंका जताई जा रही है उससे निपटने के लिए भारत को अपने स्तर पर जो आर्थिक सुधार कर लेने चाहिए थे वे तो हो ही नहीं पा रहे हैं। कौशिक बसु के बयान के बाद विपक्ष को केंद्र सरकार को नए सिरे से घेरने का मौका मिल गया है और यह स्वाभाविक भी है, लेकिन यथार्थ यह है कि विपक्षी दलों के पास भी इस सवाल का कोई जवाब नहीं है कि एक गठबंधन सरकार में सहयोगी दलों के अनावश्यक दबाव से कैसे निपटा जाए? इस प्रश्न का महत्व इसलिए और बढ़ जाता है, क्योंकि देश के मौजूदा राजनीतिक हालात को देखते हुए इसकी संभावना बहुत कम है कि अगले आम चुनाव में कोई एक दल अपने बलबूते केंद्र की सत्ता में आने में समर्थ हो सकेगा। भाजपा के नेतृत्व वाला राजग खुद को संप्रग का विकल्प मान रहा है, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि जब वह केंद्र की सत्ता पर काबिज था तब उसे भी कुछ वैसी ही कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था जैसी कठिनाइयां आज संप्रग सरकार के समक्ष उपस्थित हैं।

- नवीन शर्मा

 
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