Editorial

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गैरजिम्मेदार स्कूल

  • Posted on: 10 October 2014
  • By: admin

विवाह हो जाने के कारण छात्रा को दिल्ली के एक सरकारी स्कूल द्वारा निकाले जाने की कार्रवाई अत्यंत निंदनीय है। स्कूल की यह दलील भी बेहद आपत्तिजनक है कि शादीशुदा लड़की के स्कूल में होने से वहां का माहौल खराब होगा। उपराज्यपाल नजीब जंग के हस्तक्षेप के बाद लड़की को स्कूल में दोबारा दाखिला तो मिल गया है लेकिन घटना के बहाने यह तथ्य जरूर उजागर हो गया है कि कुछ शिक्षक अब तक अपनी रुढ़ीवादी सोच से नहीं उबर पाए हैं। इससे खराब बात और क्या होगी कि एक छात्रा का नाम केवल इसलिए स्कूल से काट दिया जाए क्योंकि उसकी शादी हो गई है। यदि विवाह को स्कूल से निकाले जाने का पैमाना मान लिया जाए तो केंद्र से लेकर तमाम राज

अव्यवस्था का आलम

  • Posted on: 17 September 2014
  • By: admin

दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) की आवासीय योजना-2014 के एलान के साथ ही शुरू हुई अव्यवस्था चिंताजनक है। कहना न होगा कि यह प्राधिकरण की लचर कार्यप्रणाली को उजागर करती है। योजना की घोषणा के दिन ही डीडीए की वेबसाइट बार-बार क्रैश हुई और डीडीए मुख्यालय में आवेदन फॉर्म लेने पहुंचे लोगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा, वहीं कई बैंकों की शाखाओं में आवेदन फॉर्म ही नहीं पहुंचे। शनिवार को यानी योजना की शुरुआत के छह दिन बाद भी संबंधित बैंकों की कई शाखाओं में लोगों को आवेदन फॉर्म के लिए भटकना पड़ा। यह स्थिति दर्शाती है कि दिल्ली विकास प्राधिकरण की तैयारियां अधूरी थीं और उसकी अधूरी तैयारियों के कारण लो

बीस लाख फ्लैट

  • Posted on: 10 September 2014
  • By: admin

निजी क्षेत्र की कंपनियों के साथ मिलकर राजधानी में अगले 12 साल में 20 लाख फ्लैट बनाने संबंधी दिल्ली विकास प्राधिकरण की योजना स्वागतयोग्य है। नई लैंड पुलिंग पॉलिसी लाकर डीडीए निजी बिल्डरों को किसानों से सीधे जमीन खरीदकर बहुमंजिली रिहाइशी इमारतें खड़ी करने की इजाजत देने जा रहा है। यह पहला अवसर है जब राजधानी में निजी क्षेत्र को आवास के क्षेत्र में इतने बड़े पैमाने पर निवेश करने का मौका दिया जा रहा है। ऐसा नहीं है कि डीडीए ने निजी क्षेत्र के साथ हाथ मिलाने की कोशिशें पहले नहीं की हों लेकिन ऐसी हर कोशिश नाकाम रही है। ऐसे में यह उम्मीद की जानी चाहिए कि डीडीए अपनी नई पहल में कामयाब होगा और निजी क्ष

वित्तीय प्रभाव

  • Posted on: 18 August 2014
  • By: admin

संसाधनों की कमी होना नई या विचित्र बात नहीं है, लेकिन इसके कारण जब वातावरण ही नहीं, कई जीवन भी प्रभावित होते दिखें तो वे कारण ढूंढऩे आवश्यक होते हैं जिनसे ऐसी स्थिति आती है। हिमाचल प्रदेश में हालत यह हो गई है कि मेडिकल बिलों का भुगतान ही नहीं हो पा रहा है। सूचनाएं तो ऐसी हैं कि ऊंट के मुंह में जीरे जैसी स्थिति है। बुढ़ापे की दहलीज पर बैठे सेवानिवृत्त कर्मचारियों के जीवन पर इस बात का कितना असर हो सकता है या हो रहा है, इस पर मंथन आवश्यक है। मेडिकल बिलों के भुगतान की परिपाटी शुरू हुई थी तब क्या हालात थे और अब क्या हैं, इस पर बात होनी चाहिए और कोई राह निकाली जानी चाहिए। विषय ऐसा है कि बात साफ ह

प्रक्रिया पर फिर सवाल

  • Posted on: 12 August 2014
  • By: admin

हरियाणा में नौकरियों में भर्ती प्रक्रिया को साढ़ेसाती से छुटकारा मिलने की संभावना नहीं दिखाई दे रही। औद्योगिक सुरक्षा बल के बर्खास्त कर्मचारी आंदोलन कर सरकार को झकझोरने की कोशिश कर रहे हैं। पीटीआइ के 1800 पदों पर नियुक्ति रद हो चुकी, गेस्ट टीचरों पर सरकार को अदालत में मुंह की खानी पड़ी, पीजीटी व कई अन्य पदों पर नियुक्ति को अदालत में चुनौती मिल चुकी। कई मामलों में भर्ती प्रक्रिया में धांधली, अनियमितता की शिकायत हुई जो अदालत में साबित भी हो चुकी। इसी क्रम में अब सिविल जूनियर इंजीनियर के सौ पदों पर भर्ती विवादों में आ गई है। चयन के लिए मेरिट सूची बनाने के तरीके को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई है

शिक्षा का गिरता स्तर

  • Posted on: 15 July 2014
  • By: admin

 ग्रेजुएशन पार्ट-वन का परीक्षा परिणाम 25 फीसद रहना शिक्षा के गिरते स्तर का परिचायक है। पिछले पांच सालों में यह अब तक का सबसे खराब परिणाम है। इससे यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि राज्य में शिक्षा का स्तर किस कदर गिर गया है। अगर अभी से इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए तो संभाग में पढ़े-लिखे युवाओं की जमात कम होती चली जाएगी। शिक्षा के गिरते स्तर के लिए अगर सरकार को भी दोषी ठहराए तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी क्योंकि पिछले दस सालों में जम्मू-कश्मीर में डिग्री कॉलेज कुकरमुत्तों की तरह खोले गए। हालत यह है कि दस सालों में 45 नए कॉलेज खोल कर सरकार ने अपनी पीठ तो थपथपा ली लेकिन शिक्षा के स्तर को

काले धन का हिसाब

  • Posted on: 30 June 2014
  • By: admin

यह संतोषजनक है कि स्विट्जरलैंड सरकार की ओर से यह कहा गया कि वह ऐसे भारतीयों की सूची बना रही है जिन पर संदेह है कि उन्होंने काला धन स्विस बैंकों में जमा कर रखा है, लेकिन देखना यह है कि ऐसी कोई सूची भारत को कब और किस रूप में हासिल होती है?

पर्यावरण के लिए

  • Posted on: 27 June 2014
  • By: admin

क्यों न आज याद किया जाए उस कुएं को जो प्यास बुझाता था लेकिन अब उसमें झांकने से उतना ही डर लगता है जितना अपने भीतर झांकने से लगता है? क्यों न हो बात आज उस बावड़ी की जो गांव के लोगों की प्यास बुझाती थी लेकिन अब खुद ही इतनी प्यासी है कि प्यास ही उसकी खुराक बन गई है?

विज्ञान में ठहराव

  • Posted on: 1 May 2014
  • By: admin

यह विज्ञान की तरक्की का युग है। लगातार बहुत सी नई-नई बातें विज्ञान के क्षेत्र में हो रही हैं। ऐसे में, यह कहना अजीब लगता है कि विज्ञान के सामने कोई संकट है, लेकिन प्रतिष्ठित विज्ञान पत्रिका नेचर में छह वैज्ञानिकों ने लिखा है कि विज्ञान में अब नई खोजें मुश्किल से हो पा रही है। इन वैज्ञानिकों ने विज्ञान के नोबेल पुरस्कार से जुड़े तथ्यों का विश्लेषण करके बताया है कि सन 1940 तक भौतिकी में सिर्फ 11 प्रतिशत, रसायनशास्त्र में 15 प्रतिशत और चिकित्सा में 24 प्रतिशत नोबेल पुरस्कार 20 साल से ज्यादा पुरानी खोजों पर दिए गए थे। सन 1985 से अब तक यह भौतिकी में 60 प्रतिशत, रसायन में 52 प्रतिशत और चिकित्सा म

बेलगाम स्कूल

  • Posted on: 31 March 2014
  • By: admin

नए शिक्षण सत्र की उल्टी गिनती के साथ ही पब्लिक स्कूलों में फिर से अभिभावकों के चौतरफा शोषण का खेल शुरू हो गया है। चिंताजनक यह कि जिम्मेदार तंत्र इस मुद्रा में जैसे उसे कुछ न तो दिखाई दे रहा और न ही सुनाई पड़ रहा है। नतीजा, पब्लिक स्कूलों के हौसले बुलंद हो रहे हैं। अभिभावकों की जेब पर बोझ डालने के लिए कई फंडे आजमाए जा रहे हैं। स्कूलों ने पहले पंजीकरण के नाम पर वसूली की और अब दाखिले के पैकेज में आधा दर्जन से ज्यादा मदें जोड़कर अभिभावकों को सिर पकडऩे पर मजबूर कर रहे हैं। कहीं विकास निधि के नाम पर तो कहीं हाइटेक क्लास रूम के नाम पर परेशानी खड़ी की जा रही हैं। यूनिफार्म और कापी किताब की धंधेबाजी

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