Editorial

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हिंदी के प्रति लोगों में क्यों घट रहा है उत्साह

  • Posted on: 26 December 2012
  • By: admin

आपने टीवी पर क्रिकेट मैच देखते हुए हिंदी में कमेंट्री तो सुनी ही होगी। वह विज्ञापन भी जरूर देखा-सुना होगा जिसमें कहा गया है, जो बात हिंदी में है, वह किसी में नहीं। जिन लोगों ने नहीं देखा है, उनके लिए बताते चलें कि विज्ञापन में ऑस्ट्रेलिया के पूर्व गेंदबाज शेन वार्न यह बात कह रहे हैं। विज्ञापन में यह कहने से पहले उन्हें किताब से हिंदी पढ़कर हिंदी सीखने की सलाह देते हुए भी दिखाया गया है। कह सकते हैं कि क्रिकेट कमेंट्री में अंग्रेजी के मुकाबले में नदारद रहने वाली हिंदी अपनी जगह बनाने में कामयाब हो रही है। खुद अंग्रेजी बोलने वाला खिलाड़ी न सिर्फ हिंदी बोल रहा है, बल्कि पढ़ भी रहा है।

गिरावट के बावजूद संभावनाओं की खिड़की

  • Posted on: 12 December 2012
  • By: admin

पिछले हफ्ते जब सैमसंग ने अपनी अल्ट्रा बुक सीरीज-5 बाजार में उतारी थी तो विंडोज 8 की बात भी आई थी। अक्टूबर में आए माइक्रोसॉफ्ट के नए विंडोज 8 को कंपनी का बड़ा दांव बताया गया था। बहरहाल, उन बातों को महीनेभर से ज्यादा का समय हो गया है। अब माइक्रोसॉफ्ट ने आधिकारिक बयान जारी कर कहा है कि उसने विंडोज 8 की लॉन्चिंग के बाद से इसके चार करोड़ लाइसेंस बेच दिए हैं। माइक्रोसॉफ्ट की इस घोषणा के साथ ही एक और रिपोर्ट आई थी। रिसर्च फर्म एनपीडी के अनुसार विंडोज आधारित डिवाइसेज की बिक्री में पिछले साल की तुलना में नवंबर में 21 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। एक तरफ माइक्रोसॉफ्ट का एलान है तो दूसरी तरफ यह रिप

आधार पर भरोसा

  • Posted on: 2 November 2012
  • By: admin

आधार की दूसरी सालगिरह पर जिस तरह प्रधानमंत्री से लेकर वित्त मंत्री और सोनिया गांधी तक ने आधार कार्ड पर भरोसा जताया है, उससे साफ है कि अब तक विवादों में रहा यह कार्ड अब स्वीकार्य होता नजर आ रहा है। इसकी वजह है इसे खुद सोनिया गांधी का समर्थन हासिल होना। कार्ड की दूसरी सालगिरह पर सबसे आश्चर्यजनक रहा अब तक इसके विरोधी रहे चिदंबरम का इसके समर्थन में आ जाना। इससे साफ होता है कि नेताओं की सोच उन्हें मिले मंत्रालय भी तय करते हैं। गृह मंत्री रहते आधार कार्ड को चिदंबरम का समर्थन नहीं मिल पाया था। मूलत: योजना आयोग की इस योजना को गृह मंत्रालय ने कभी मान्यता नहीं दी। यह गृह मंत्रालय का विरोध ही था कि बै

सम्पादकीय...

  • Posted on: 12 October 2012
  • By: admin

झारखंड हाईकोर्ट ने आइआइटी को निर्देश देते हुए उससे झारखंड निवासी तौसीफ रजा को उनके हिंदी में प्राप्त प्रमाणपत्रों के साथ ही प्रवेश देने का निर्देश दिया है। असल में आइआइटी ने तौसीफ के चयन के बाद उनसे झारखंड शिक्षा बोर्ड द्वारा जारी प्रमाण पत्र के हिंदी में होने के कारण इसे अंग्रेजी में लाने को कहा था, जिस पर तौसीफने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था और राज्य सरकार को भी इस मुद्दे में घसीटा था। कोर्ट ने दो टूक कहा कि हिंदी देश की आधिकारिक भाषा है और इसमें जारी किए गए किसी भी प्रमाणपत्र को देश में कहीं भी लेने से इन्कार नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि वे भाषा विशेष में दिए गए किसी भी प्रमाणप

पहचान के नंबर में बदलने के अर्थ

  • Posted on: 1 October 2012
  • By: admin

पिछले कई महीनों से हमारे आस-पास के किसी बैंक में कुछ लोग लाइन में लगे होते हैं। मशीनों के साथ बैठे कुछ लोग उनके फिंगर प्रिंट और आंखों की रेटिना की तस्वीरें ले रहे होते हैं। जिनके फिंगर प्रिंट और रेटिना की तस्वीरों को मशीन क्लियर कर देती है, वे खुश। जिनकी पहचान फेल हो जाती है, वे कई बार के प्रयास के बाद भी उदास लौट रहे होते हैं। यहां भारतीय राज्य और राज्य निर्धारित जनतंत्र का एक उत्सव चल रहा होता है। यह उत्सव है, 'आधार कार्ड बनने का।Ó आधार कार्ड भारत में सूचना प्रौद्योगिकी के अगुआ नंदन नीलेकणि के नेतृत्व में भारत सरकार के एक आदेश के तहत बनी स्वायत्त संस्था के जरिये बनाया जा रहा है। लोगों को

राष्ट्रपति से अपेक्षाएं

  • Posted on: 21 August 2012
  • By: admin

राष्ट्रपति पद की शपथ ग्रहण में प्रणब मुखर्जी ने निराश किया। आशा की जा रही थी कि वह राष्ट्रपति पद की शपथ अपनी मातृभाषा अथवा राष्ट्रभाषा में लेंगे, पर उन्होंने उस भाषा में शपथ ग्रहण की जिसमें हमारे देश की गुलामी का आदेश दिया गया था। आम दिनों में कोई नेता, अधिकारी अथवा नागरिक किसी भी भाषा का प्रयोग करे, उसका महत्व कम है पर जब राष्ट्रपति पद की शपथ ग्रहण जैसा राष्ट्रीय समारोह हो, तब अपने देश की भाषाओं को नकारकर गुलामी की प्रतीक भाषा को कंठहार बनाना करोड़ों भारतीयों को कितनी पीड़ा दे गया इसका अनुमान संभवत: संसद के केंद्रीय हाल में बैठे नेता और स्वयं राष्ट्रपति भी नहीं लगा पाए। राष्ट्रपति ने शपथ ल

रेल रोको कितना उचित?

  • Posted on: 9 August 2012
  • By: admin

सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार से सवाल किया है कि रेल रोको, चक्का जाम व सड़कों को जाम करने जैसे आंदोलनों के दौरान यदि सरकारी सम्पत्ति को नुकसान होता है तो वर्तमान कानूनी प्रावधानों के तहत क्या संबंधित राजनीतिक दलों या अन्य संगठनों की मान्यता रद्द की जा सकती है?

अहम है शिक्षा में बुनियादी सुधार

  • Posted on: 16 July 2012
  • By: admin

यह हमारे ही देश में संभव है कि शिक्षा में बुनियादी सुधारों की बजाय आरक्षण को हथियार बनाकर उसके दोहन के प्रयास किए जाते हैं। मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक बदलाव में जो उत्साह दिखा रहे हैं, उनकी पृष्ठभूमि में शिक्षा में गुणवत्ता की दृष्टि से सुधार लाना कम, शिक्षा का अंग्रेजीकरण और शिक्षा को निजी शिक्षा केंद्रों के टापुओं में बदलने की कवायद ज्यादा है। जबकि हमारे उद्देश्य ये होने चाहिए कि शिक्षा क्षेत्र से एक तो असमानता दूर हो, दूसरे वह केवल पूंजी से हासिल करने का आधार न रह जाए। इस नजरिये से आइआइटी परिषद ने आइआइटी में प

ई-बुक्स के बाजार में पिछड़ते हिंदी लेखक

  • Posted on: 16 July 2012
  • By: admin

पिछले करीब तीन महीनों से ईएल जेम्स की फिफ्टी शेड्स ट्रायोलॉजी यानी तीन किताबें- फिफ्टी शेड्स ऑफ ग्रे, फिफ्टी शेड्स डार्कर, फिफ्टी शेड्स फ्रीड अमेरिका में प्रिंट और ई एडीशन दोनों श्रेणी में बेस्ट सेलर बनी हुई हैं। जेम्स की इन किताबों ने अमेरिका और यूरोप में इतनी धूम मचा दी है कि कोई इस पर फिल्म बना रहा है तो कोई उसके टेलीविजन अधिकार खरीद रहा है। फिफ्टी शेड्स ट्रायोलॉजी लिखे जाने की कहानी भी बेहद दिलचस्प है। टीवी की नौकरी छोड़कर पारिवारिक जीवन और बच्चों की परवरिश के बीच एरिका ने शौकिया तौर पर फैनफिक्शन नाम के वेबसाइट पर मास्टर ऑफ यूनिवर्स के नाम से एक सिरीज

सूचनाओं का महत्व

  • Posted on: 29 June 2012
  • By: gaurav

सूचना क्रांति के दौर में सोशल साइटों को लेकर बढ़ती ललक ने भले ही सूचनाओं के प्रवाह को बढ़ावा दिया है। आए दिन फेसबुक पर ऐसे फोटो और सूचनाएँ लोड कर दिए जाते हैं, जिन्हें लेकर अदालती और प्रशासनिक हलकों की तरफ से मनाही होती है। इसे ताकत और इस माध्यम का बेजा इस्तेमाल मानने वाले दोनों तरह के लोग हैं। इसे बेजा इस्तेमाल मानने की शुरूआत भ्रष्टाचार विरोधी अण्णा हजारे और बाबा रामदेव के आंदोलन के साथ ही हुई।  निश्चिततौर पर तब कई बार भ्रष्टाचार विरोधियों ने कॉर्पोरेट के कुछ काले सच से राजनीति के अंदरूनी संबंधों को इन साइटों के जरिए ना सिर्फ उछाला, बल्कि नाराजगी में सत्ता के शीर्ष पर काबिज उन लोगों के खि

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