सितंबर में थोक महंगाई दर बढ़कर 5.13 फीसद पर पहुंची

  • Posted on: 25 October 2018
  • By: admin

नई दिल्ली। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले गिरते रुपये को थामने और चालू खाते के घाटे (सीएडी) को काबू रखने की कोशिशों में जुटी सरकार के लिए महंगाई चुनौती बन रही है। महंगे होते पेट्रोल व डीजल के अलावा गेहूं और आलू जैसी खाद्य वस्तुओं के भाव में तेजी आने से थोक महंगाई दर सितंबर में बढ़कर 5.13 प्रतिशत हो गयी है। थोक महंगाई को काबू रखने के लिए केंद्र को अर्थव्यवस्था में आपूर्ति सुचारु बनाए रखने के उपायों पर जोर देना होगा।
खुदरा महंगाई भी सितंबर में बढ़कर 4.53 फीसद पर पहुंच गई थी। थोक महंगाई दर इस साल अगस्त में 4.53 प्रतिशत तथा पिछले साल सितंबर में 3.14 प्रतिशत थी। सितंबर में खाद्य वस्तुओं की महंगाई दर में गिरावट (-0.21 प्रतिशत) दर्ज की गयी लेकिन आलू की महंगाई दर 80 प्रतिशत तथा गेहूं की 8.87 प्रतिशत रही है। वैसे दलहन और अन्य सब्जियों की महंगाई कम हुई है। दूसरी ओर ईंधन और बिजली श्रेणी की थोक महंगाई दर में अच्छी खासी वृद्धि हुई है। मसलन, सितंबर में एलपीजी की मुद्रास्फीति 33.51 प्रतिशत, पेट्रोलियम की 17.21 प्रतिशत और डीजल की 22.18 प्रतिशत रही है। सरकार ने हाल में पेट्रोल-डीजल के मूल्यों में राहत देने को कदम उठाया भी था लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के चलते यह राहत बेअसर हो गई। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक मैन्युफैक्चरिंग उत्पादों की महंगाई भी सितंबर में 4.22 प्रतिशत बढ़ी है। वैसे चीनी की महंगाई में लगभग 13 प्रतिशत की कमी आयी है। मैन्युफैक्चर्ड उत्पादों में कई धातुओं की महंगाई भी बढ़ी है। वैसे तो रिजर्व बैंक अपनी मौद्रिक नीति तय करते वक्त खुदरा महंगाई दर को संज्ञान में लेता है और उसने खुदरा महंगाई दर चार प्रतिशत (दो प्रतिशत कम या ज्यादा) पर नियंत्रित रखने का लक्ष्य रखा है लेकिन थोक महंगाई को नियंत्रित रखना भी अर्थव्यवस्था के लिए बेहद आवश्यक है। थोक महंगाई दर का आकलन थोक भावों यानी मंडी के भाव के आधार पर होता है। अंतत: इसका असर खुदरा महंगाई पर पड़ता है। थोक महंगाई में अगर बढ़ोतरी जारी रहती है तो सरकार पर अर्थव्यवस्था में आपूर्ति तंत्र सुधारने का दबाव बन जाएगा।

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