वक्त पर न चेतने का रोग

  • Posted on: 25 February 2018
  • By: admin
पंजाब नेशनल बैंक में बड़ा घोटाला सामने आने के बाद बड़े पैमाने पर बैंक कर्मचारियों के तबादले के साथ वित्त मंत्रालय और रिजर्व बैंक की ओर से बैंकिंग व्यवस्था की खामियां पता करने की कोशिश एक तरह से चिडिय़ा चुग गई खेत वाली कहावत को ही चरितार्थ कर रही है। बैंकिंग व्यवस्था के साथ सरकार की साख को बट्टï लगाने वाले कारनामे के बाद दिखाई जा रही सक्रियता से तो यही लगता है
कि सभी जिम्मेदार लोग घोटाला होने का इंतजार कर रहे थे। आखिर नीरव मोदी की कारगुजारी का पता लगने के पहले किसी ने इसकी चिंता क्यों नहीं की कि सरकारी बैंक आवश्यक नियम-कानूनों और निगरानी तंत्र का पालन करते हुए पर्याप्त सतर्कता बरत रहे हैं या नहीं? क्या वित्त मंत्रालय और साथ ही रिजर्व बैंक को तभी नहीं चेत जाना चाहिए था जब नोटबंदी के बाद यह साफ हो गया था कि बैंकों ने जमकर मनमानी की है? रिजर्व बैंक की यह जवाबदेही बनती है कि उसने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रचलित इलेक्ट्रॉनिक वित्तीय प्लेटफार्म स्विफ्ट को कोर बैंकिंग सिस्टम के दायरे में लाना अनिवार्य क्यों नहीं बनाया? इस सवाल का जवाब इसलिए मिलना चाहिए, क्योंकि 2016 में बांग्लादेश में एक बैंक से हुई 8.1 करोड़ डॉलर की धोखाधड़ी में स्विफ्ट संदेश प्रणाली की ही खामी सामने आई थी। समझना कठिन है कि इसके बाद रिजर्व बैंक ने भारतीय बैंकों से केवल सावधान रहने को कहकर कर्तव्य की इतिश्री क्यों कर ली? आखिर उसने यह सुनिश्चित क्यों नहीं किया कि बैंक हर हाल में स्विफ्ट संदेश प्रणाली को कोर बैंकिंग सिस्टम का हिस्सा बनाएं? अगर रिजर्व बैंक ने बैंकों को इसके लिए बाध्य किया होता तो शायद नीरव मोदी का गोरखधंधा पहले ही पकड़ में आ जाता। पंजाब नेशनल बैंक के घोटाले पर वित्त मंत्री की ओर से यह जो संकेत दिया गया कि बैंक प्रबंधन और ऑडिटर्स के खिलाफ भी कार्रवाई हो सकती है उसके संदर्भ में भी यह सवाल उठता है कि आखिर इसके पहले और खासकर तभी बैंकिंग प्रबंधन और बैंकों की ऑडिट व्यवस्था को दुरुस्त करने की कोई ठोस पहल क्यों नहीं हुई जब फंसे कर्ज की समस्या बेलगाम होती दिख रही थी? सरकारी बैंकों की नियामक संस्था रिजर्व बैंक के साथ यह नैतिक जिम्मेदारी तो वित्त मंत्रालय की भी बनती थी कि वह बैंकों के कुप्रबंधन को ठीक करने के लिए अपने स्तर पर उचित कदम उठाता। यदि सरकारी बैंकों के फंसे कर्ज एनपीए में तब्दील होते जा रहे हैं और सक्षम लोग कर्ज लौटाने के बजाय बहाने बनाकर मौज कर रहे हैं तो इसीलिए कि बैंकों का प्रबंधन कुप्रबंधन का पर्याय बन गया है। 
 
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