रुपया संभालने में सक्षम आरबीआई

  • Posted on: 10 May 2018
  • By: admin
कच्चे तेल के अंतरराष्ट्रीय भावों में आयी उछाल और उसके साथ ही डॉलर की मजबूती ने भारतीय रुपये पर दोहरा वार किया और रुपया डॉलर की तुलना में 67 के स्तर के नीचे चला गया, यानी एक डॉलर की कीमत 67 रुपये से ज्यादा हो गयी. यह करीब डेढ़ साल में रुपये का सबसे कमजोर स्तर है. लोगों ने आशंका जतायी कि आनेवाले दिनों में डॉलर का भाव 70 रुपये के भी ऊपर चला जायेगा. क्या वाकई ऐसा हो सकता है? अगर ऐसा हुआ, तो देश की अर्थव्यवस्था पर उसका असर क्या होगा? रुपये की कमजोरी के पीछे एक पहलू यह भी बताया जा रहा है कि अमेरिका में बॉन्डों पर कमाई (यील्ड) बढऩे के चलते विदेशी निवेशकों के लिए खुद अमेरिकी बाजार ज्यादा आकर्षक हो गया है.
वहीं भारतीय शेयर बाजार ऊंचे स्तर पर होने के कारण यहां शेयरों का मूल्यांकन उन्हें महंगा लगने लगा है। इसके चलते विदेशी संस्थागत निवेशक (एफआईआई) भारतीय शेयर बाजार में लगातार बिकवाली करके वह पैसा वापस ले जा रहे हैं. जब वे पैसा वापस ले जाते हैं, तो भारत से डॉलर बाहर जाते हैं, जिसके चलते रुपया कमजोर होता है। इक्विटी श्रेणी में एफआईआई की बिकवाली को ऊपरी स्तरों पर थोड़ी-थोड़ी मुनाफावसूली के रूप में ही देखा जा सकता है. अप्रैल में भारतीय इक्विटी बाजार में उनकी शुद्ध बिकवाली करीब एक अरब डॉलर (6,468 करोड़ रुपये) की रही है. पर इससे पहले जब मार्च में भारतीय बाजार कुछ नीचे आ गया था, तो उस दौरान एफआईआई ने करीब दो अरब डॉलर (13,372 करोड़ रुपये) की शुद्ध खरीदारी भी की थी. मगर दूसरी ओर ऋण (डेब्ट) बाजार में एफआईआई पिछले तीन महीनों से लगातार पैसे बाहर निकाल रहे हैं. यह अमेरिकी बाजार में यील्ड बढऩे का असर ही है। हालांकि रुपये पर असर डालनेवाला मुख्य कारण अभी कच्चे तेल का भाव और डॉलर की अन्य देशों की मुद्राओं के सापेक्ष मजबूती ही है. विश्व बाजार की इस उठापटक में भारत सरकार या आरबीआई की ओर से कुछ खास किया भी नहीं जा सकता है. 
इसलिए यदि कच्चे तेल की कीमत का बढऩा जारी रहा, तो रुपये में आगे और भी कमजोरी आ सकती है. कुछ जानकार कह रहे हैं कि रुपया आनेवाले महीनों में 70 के आसपास तक गिरने के बाद ही स्थिर होगा. हालांकि, दूसरा नजरिया यह है कि रुपया 65-68 डॉलर के दायरे में ही घूमता रहेगा. अगर यह किसी उथल-पुथल में 70 की ओर गया भी, तो ज्यादा देर तक वहां नहीं रहेगा.
 
Category: