मौजूदा तकनीकी युग में डिजिटल भरोसा मजबूत करने की दरकार

  • Posted on: 10 August 2018
  • By: admin
भारत में डिजिटल लेन-देन और इस प्रारूप के जरिये होनेवाली विभिन्न गतिविधियों के संदर्भ में आपसी विश्वास बहाली का रिश्ता पूरी तरह से नहीं पनप पाया है. व्यक्तिगत डेटा में सेंधमारी और कई प्रकार की आशंकाओं की खबरों से इस भरोसे को मजबूती नहीं मिल पा रही है. ्रअमेरिका की टफ्ट्स यूनिवर्सिटी के द फ्लेचर स्कूल के एसोसिएट डीन ऑफ इंटरनेशनल बिजनेस एंड फाइनेंस और ब्रूकिंग्स इंडिया नॉन-रेजिडेंट सीनियर फेलो भास्कर चक्रवर्ती ने हाल ही में इस संदर्भ में अपनी चिंता जतायी है. क्या है यह चिंता और इससे जुड़े अन्य पहलू... 
इस धरती पर इंसानों से अधिक संख्या मोबाइल फोन की हो चुकी है. सोशल मीडिया पर सक्रिय यूजर्स की बात करें, तो केवल फेसबुक पर ही दो अरब से अधिक लोग जुड़े हैं.  वहीं भारत के संदर्भ में सरकारी पहचान आइडी आधार की बात करें, तो 93 फीसदी से अधिक आबादी इसके दायरे में आ चुकी है. हमारे व्यक्तिगत और बेहद उपयोगी आंकड़ों को सरकारों और सोशल मीडिया नेटवर्किंग साइटों के बीच डिजिटल माहौल में आपसी भरोसे को मजबूत बनाये रखना सबसे जरूरी तथ्य है, क्योंकि हमारे अस्तित्व की निर्भरता इन चीजों पर बढ़ती जा रही है. हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में जैसे-जैसे तकनीक की दखल बढ़ती जा रही है, बतौर नागरिक हमें विविध किस्म की डिजिटल खामियां उभरती हुई दिखती हैं। इनमें कुछ चीजें इतनी आसान हैं कि चीजों  को खोजने के क्रम में गूगल की अलगोरिद्म की रिवर्स इंजीनियरिंग हमें उन वेबसाइट तक ले जा सकती है, जिनमें इच्छित सामग्रियों के हासिल होने की अधिक संभावना होती है. अक्सर यहां मिनटों या घंटों में बेहद सक्षम तरीके से लाखों यूजर्स जरूरी चीजों की खोज करते हैं. चुनाव नतीजों से लेकर ब्रेक्जिट वोट, और विविध प्रकार की सूचनाएं इस प्रकार ऑनलाइन हासिल हो रही हैं, जैसा इतिहास में शायद पहले नहीं हुआ होगा।
चार तथ्यों की होगी व्यापक भूमिका-आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, पब्लिक डेटाबेस, ऑनलाइन सर्च हिस्ट्री और सोशल मीडिया प्रोफाइल के साथ डिजिटल प्लेनेट को नया आकार देने के मामले में सरकारें अहम भूमिका निभा सकती हैं. जैसे-जैसे टेक्नोलॉजी और ऑटोमेशन एडवांस होते हैं, भविष्य में कार्य निर्धारण और नौकरी के अवसरों को सृजित करने पर उनका असर पड़ता है। दूसरी ओर, आम लोग भी धीरे-धीरे उनमें छिपी वास्तविकताओं से रूबरू होते हैं, और रोजमर्रा की जिंदगी में डिजिटल तौर पर उनका असर पड़ता है. वर्ष 2024 तक भारत  उस मुकाम तक पहुंचने में सक्षम हो सकेगा, जहां पर आज चीन खड़ा है, और इसमें इन चार तथ्यों की व्यापक भूमिका होगी: उभरता हुआ फिजिकल इंफ्रास्ट्रक्चर, डिजिटल स्वरूप का विस्तार, महिलाओं की बड़ी आबादी के ऑनलाइन जुडऩे और शोध व विकास में व्यापक निवेश।
डिजिटल इवोलुशन इंडेक्स 
अपने रिसर्च में चक्रवर्ती ने डिजिटल इवोलुशन इंडेक्स पर फोकस किया है, जो एक सूचक है, जिसमें देशों के बीच डिजिटल प्रतिस्पर्धा की माप की गयी है. इसमें 60 देशों की रैंकिंग की गयी है, जिसमें  विविध किस्म के डिजिटल सूचकों को शामिल किया गया है. इसमें चार मुख्य चीजों को शामिल किया गया है: - सप्लाई साइड  < डिमांड साइड, - इंस्टीट्यूशनल एनवायरमेंट < नवोन्मेष व बदलाव. 
भारतीयों में उच्च स्तर की सहनशीलता-देशभर में डिजिटल भरोसे का विश्लेषण करने पर पाया गया कि भारतीय लोग अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में डिजिटल लेन-देन के मामले में इस तरह की वैमनस्यता की दशा में उच्च रूप से सहनशील होते हैं. ऑनलाइन गतिविधियों में भारतीयों में उच्च स्तर की सहनशीलता पायी गयी है, लेकिन सुरक्षा, जवाबदेही और निजता के मामले में उनका रवैया बेहद लचर है.
 
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