मैसेंजर के लिए संदेश

  • Posted on: 10 February 2018
  • By: admin
यह तो मानना ही होगा कि मोबाइल फोन, और खासकर तरह-तरह के मैसेंजर ने जिंदगी को आसान बना दिया है। यहां तक कि लोगों को, और खासकर रिश्तों को जुडऩे का एक नया मंच दे दिया है। हालांकि समाजशास्त्री व मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि यह इसका एक पक्ष है, जिसे हम इन दिनों जी रहे हैं और जो बहुत अच्छा भी लगता है। लेकिन इसके दूसरे पक्ष में खतरे की घंटी है।
तमाम अध्ययन इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि ये मैसेंजर अगर कुछ खास तरह की दूरियां घटा रहे हैं, तो कुछ और तरह की दूरियां बढ़ा भी रहे हैं। सबसे बड़ी बात है कि ये हमारी सामाजिक संभावनाओं के रास्ते में बाधा खड़ी कर रहे हैं। हालांकि यह बात नई पीढ़ी पर ज्यादा लागू होती है, जिसके संवाद के सारे रास्ते आजकल मैसेंजर के माध्यम से ही खुलते हैं। पिछले दिनों ब्रिटेन के संस्थान कैंसर रिसर्च ने 18 से 24 साल के नौजवानों पर जब इसे लेकर एक अध्ययन किया, तो जो नतीजे मिले, वे चौंकाने वाले थे। 44 फीसदी नौजवानों ने यह बताया कि उन्हें मैसेंजर या सोशल मीडिया के जरिए संवाद करना ज्यादा सुविधाजनक लगता है, बजाय आमने-सामने बातचीत के। हालांकि 37 फीसदी को आमने-सामने संवाद में कोई दिक्कत नहीं थी। इसके पहले एक अध्ययन में यह पाया गया था कि सोशल मीडिया का ज्यादा इस्तेमाल करने वाले नौजवान समाज में अपने को ज्यादा अलग-थलग महसूस करते हैं। ताजा अध्ययन में यह पाया गया कि नई पीढ़ी के नौजवान अपने पड़ोसियों से बात करेंगे, इसकी संभावना पिछली पीढ़ी के मुकाबले 20 गुना तक कम हो चुकी है। 27 फीसदी नौजवानों ने बताया कि उन्होंने बस में किसी अजनबी से कभी बात नहीं की।
यह बुरी खबर इसलिए है कि इंटरनेट के सोशल नेटवर्क से अलग वास्तविक जिंदगी का जो सामाजिक ताना-बाना होता है, पड़ोसी और अजनबी हमेशा से उसका महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं। पड़ोसी से हाथ मिलाना, उसका हाल-चाल पूछना, हर रोज बस या ट्रेन में मिलने वाले सहयात्री को देखकर मुस्कराना हमेशा संभावनाओं के नए दरवाजे भले ही न खोलता हो, लेकिन यह एहसास तो देता ही है कि हम एक बड़े समाज का अभिन्न हिस्सा हैं। साथ ही यह हमारी तमाम तनावों वाली दिनचर्या में खुशनुमा क्षणों के कुछ झोंके भी लाता है। इस अध्ययन को करने वाली रेबेका बीकेन का कहना है कि सामाजिक अलगाव का अर्थ होता है खराब स्वास्थ्य, यानी यह सेहत के हिसाब से भी गलत है। 
 
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