भारत में बीस फीसद बढ़ी अति अमीरों की संख्या

  • Posted on: 25 June 2018
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मुंबई। भारत में बीते साल अति अमीरों की संख्या में 20 फीसद की वृद्धि हुई। इस दौरान इनकी संपत्ति में भी जबर्दस्त उछाल आया। अति अमीरों की तादाद बढऩे के मामले में भारत सबसे तेज उभरती अर्थव्यवस्था बन गया है। फ्रांसीसी टेक फर्म केपजेमिनी की रिपोर्ट में यह बात सामने आई। रिपोर्ट के मुताबिक, 2017 में भारत में अति अमीरों की संख्या 20.4 फीसद बढ़कर 2.63 लाख पर पहुंच गई।
वहीं इस दौरान उनकी कुल संपत्ति 21 फीसद बढ़कर एक लाख करोड़ डॉलर (डॉलर की वर्तमान दर से 68 लाख करोड़ रुपये से अधिक) पर पहुंच गई। यह देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के एक तिहाई के बराबर है। 2017 में अमीरों की संख्या बढऩे के मामले में भारत की दर सबसे तेज रही। बीते साल ग्लोबल स्तर पर अमीरों की संख्या में औसतन 11.2 फीसद की और उनकी कुल संपत्ति में 12 फीसद की वृद्धि हुई है। अति अमीर की श्रेणी में उन लोगों को रखा जाता है जिनकी कुल निवेशयोग्य संपत्ति 10 लाख डॉलर (डॉलर की वर्तमान दर से करीब 6.8 करोड़ रुपये) से ज्यादा होती है।
रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका, जापान, जर्मनी और चीन इस मामले में सबसे आगे हैं। 2017 में आए उछाल के बाद भारत इस मामले में 11वें स्थान पर पहुंच गया है। भारत में अति अमीरों की संख्या में बढ़ोतरी में बीते साल बाजार पूंजीकरण में आए 50 फीसद से ज्यादा के उछाल की अहम भूमिका रही। इसके अलावा समीक्षाधीन वर्ष में रियल्टी सेक्टर में कीमतों में 4.8 फीसद और सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 6.7 फीसद की दर से वृद्धि हुई। इस मामले में भी भारत वैश्विक औसत से आगे रहा।
रिपोर्ट में कहा गया कि जुलाई, 2017 में वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू होने से संपत्ति पर थोड़ा असर पड़ा, लेकिन यह अस्थायी था। इसके अलावा स्थिर मौद्रिक नीति, नोटबंदी का असर खत्म होने और बचत की ओर रुख करने से लोगों को संपत्ति बढ़ाने में मदद मिली। गौरतलब है कि जनवरी में अंतरराष्ट्रीय अधिकार समूह ऑक्सफेम ने देश में संपत्ति के बंटवारे पर रिपोर्ट जारी की थी। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की 120 करोड़ की आबादी में से ऊपर के एक फीसद लोगों का कब्जा 2017 में सृजित कुल संपत्ति के 73 फीसद हिस्से पर था। वहीं दूसरी ओर, 67 करोड़ लोगों यानी देश की आधी आबादी के पास केवल एक फीसद संपत्ति थी। ऐसी स्थिति में अति अमीरों की बढ़ती संख्या और गरीबों की स्थिति जस की तस बनी रहने को लेकर सरकारों की नीतियां अक्सर सवालों के घेरे में रहती हैं।
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