बैंकों के विलय का सवाल

  • Posted on: 25 June 2018
  • By: admin
सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के विलय पर चर्चा को आगे बढ़ाना समय की मांग भी है और जरूरत भी। यह अच्छा हुआ कि कोयला एवं रेल मंत्रालय के साथ वित्त मंत्रालय का भी कामकाज देख रहे पीयूष गोयल ने बैंकों के विलय के सवाल पर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक प्रमुखों से विचार-विमर्श किया। बैंकों के विलय के सवाल को और अधिक टालने का मतलब इसलिए नहीं, क्योंकि इस पर लंबे समय से विचार-विमर्श ही हो रहा है। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के विलय को लेकर पहले वाजपेयी सरकार के समय विचार हुआ और फिर मनमोहन सरकार के समय भी, लेकिन किन्हीं कारणों से किसी नतीजे पर नहीं पहुंचा जा सका।
यदि तभी कोई फैसला ले लिया गया होता तो शायद आज सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक उन तमाम समस्याओं से नहीं जूझ रहे होते, जिनसे वे बुरी तरह घिरे हुए हैं। यदि बैंकों के विलय के विचार को वक्त रहते अमल में ले आया गया होता तो शायद एनपीए के रूप में फंसे कर्ज की समस्या भी इतना गंभीर रूप नहीं लेने पाती। बीते कुछ समय से स्थिति यह है कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक केवल अपने एनपीए के कारण ही चर्चा में हैं। नि:संदेह बैंकों को एनपीए के संकट से बाहर निकलना ही होगा, लेकिन इसी के साथ उन्हें कार्यकुशल और जवाबदेह भी बनना होगा। इतना ही नहीं, उन्हें यह भी समझना होगा कि उनका एक बुनियादी काम कर्ज बांटना भी है। चूंकि इधर एक अरसे से बैंकों पर एनपीए संकट को हल करने का दबाव है, इसलिए वे कर्ज देने में जरूरत से ज्यादा सतर्कता बरत रहे हैं। इस अतिरिक्त सतर्कता के चलते कारोबारियों को कर्ज मिलने में कठिनाई हो रही है। ऐसे में यह जरूरी था कि कोई बैंकों को यह याद दिलाता कि सतर्कता बरतने का मतलब कर्ज देने से इनकार करना नहीं हो सकता। अगर बैंकों से कर्ज मिलना कठिन हो जाएगा तो फिर कारोबार और अर्थव्यवस्था को अपेक्षित गति कैसे मिलेगी? अच्छी बात है कि बतौर वित्त मंत्री पीयूष गोयल के हस्तक्षेप के बाद स्थिति बदलती दिख रही है, लेकिन इस धारणा को दूर करने की जरूरत है कि घोटालों के सिलसिले के बाद सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से कर्ज लेना कठिन हो गया है। जहां तक बैंकों के विलय की बात है, बतौर वित्त मंत्री पीयूष गोयल के लिए इस अधूरे एजेंडे को पूरा करने में इसलिए आसानी होनी चाहिए, क्योंकि वह मंत्रियों के उस दल का हिस्सा हैं, जिसे सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के विलय पर आने वाले प्रस्तावों पर अंतिम फैसला करना था। बैंकों के विलय के काम को इसलिए वरीयता दी जानी चाहिए, क्योंकि एक तरह से वह समयसीमा खत्म हो चुकी है, जिसमें कोई फैसला ले लिया जाना था। 
 
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