पृथ्वी को बचाने की मुहिम शुरू करने का दिन

  • Posted on: 25 April 2018
  • By: admin
गत दिनों पृथ्वी दिवस मनाया गया। यह दिन एक ऐसे महापुरुष की दृढ़ इच्छाशक्ति के लिए जाना जाता है, जिन्होंने ठान लिया था कि हमें अपने गृह पृथ्वी के साथ किए जा रहे व्यवहार में बदलाव लाना है। वह थे अमेरिका के पूर्व सीनेटर गेराल्ड नेल्सन। उन्होंने ही सबसे पहले 22 अप्रैल, 1970 को दो करोड़ लोगों के बीच पहला पृथ्वी दिवस मनाया गया था।यानी लगभग पांच दशक पहले जब न ग्लोबल वार्मिंग के खतरे आज की तरह नजर आ रहे थे और न ही प्रदूषण की समस्या इतनी खतरनाक हुई थी। उनका विचार था कि पर्यावरण संरक्षण हमारे राजनीतिक एजेंडे में शामिल होना चाहिए। यह ऐसी सोच थी,
जो आज भी पूरी दुनिया के लिए एक हसरत की तरह ही है। शायद उस समय ही सब चेत गए होते, तो आज यह खतरा उतनी बड़ा नहीं होता।
अब जब यह खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है, तो हमारे लिए यह दिन पहले से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है। लेकिन सच यही है कि आज इस धरती की चिंता कोई नहीं कर रहा। किसी भी राजनीतिक दल से इसकी उम्मीद नहीं बनती। यह मुद्दा राजनीतिक एजेंडे में है ही नहीं। शायद इसलिए कि पृथ्वी कोई वोट बैंक नहीं है। भले ही यह हमारे अस्तित्व का आधार है, जीवन का केंद्र है। समस्या का सबसे बड़ा कारण यह है कि हमने इस पृथ्वी को उपभोग का साधन मान लिया है। आर्थिक, व्यापारिक और कुछ हद तक सामाजिक तौर भी हम इसे एक संसाधन भर मानते हैं, जबकि यह मानव जीवन के साथ-साथ लाखों-लाख वनस्पतियों-जीव-जंतुओं की आश्रय स्थली भी है। पृथ्वी में जीवाश्म ईंधन का विशाल भंडार है, लेकिन इसका जिस तेजी से दोहन हो रहा है, उसकी मिसाल मुश्किल है। यह ऐसा संसाधन है, जो रिसाइकिल नहीं हो सकता। और हम रिसाइकिल होने वाले संसाधनों को छोड़कर इसके पीछे पड़े हैं। प्राकृतिक संसाधनों के इस अति दोहन से जैव-विविधता पर संकट मंडराने लगा है। प्रदूषण की अधिकता के कारण देश की अधिकांश नदियां अस्तित्व के संकट से जूझ रही हैं। उनके आस-पास स्वस्थ जीवन की कल्पना बेमानी है। कोयला जनित बिजली से न केवल प्रदूषण होता है, बल्कि हरे-भरे समृद्ध वनों का भी विनाश होता है। 'इंटर गवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंजÓ के अध्ययन खुलासा करते हैं कि बीती सदी के दौरान पृथ्वी का औसत तापमान 1़4 डिग्री फारेनहाइट बढ़ चुका है। 
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