टिक टॉक पर पाबंदी

  • Posted on: 25 April 2019
  • By: admin

हल्ला हालांकि पूरी दुनिया में है, लेकिन मोबाइल फोन के लिए वीडियो के सोशल मीडिया एप टिक टॉक की दुकान भारत में तो फिलहाल बंद हो गई है। चीन में तैयार यह एप पिछले कुछ समय में काफी तेजी से लोकप्रिय हुआ था। खासकर नई पीढ़ी के नौजवानों में इसने बहुत तेजी से जगह बनाई थी। इससे पहले कि इसका नाम सुर्खियों में आता, भारत में इसके पांच करोड़ से ज्यादा उपयोगकर्ता हो गए थे।
वैसे भारत में ही नहीं, पूरी दुनिया में यही हाल था। अमेरिका में इस साल की पहली तिमाही में सबसे ज्यादा डाउनलोड होने वाला मोबाइल एप टिक टॉक ही था। इसके अचानक ही लोकप्रिय हो जाने के कारण भी स्पष्ट हैं। यह ऐसा एप है, जिस पर बहुत छोटे वीडियो डाले और साझा किए जा सकते हैं, एक चौथाई मिनट से भी कम के। इसीलिए यह यू-ट्यूब से ज्यादा सुविधाजनक भी है। वहां वीडियो अपलोड करने में लंबा समय लगता है, जबकि टिक टॉक पर यही काम कुछ सेकंड में हो जाता है। शायद इसलिए नई पीढ़ी ने इसे हाथों-हाथ लिया। इसके साथ ही छोटे-छोटे वीडियो बनाने और इसके लिए कुछ भी कर गुजरने का पागलपन बढ़ा। इसके बहुत तेजी से प्रसार ने लोगों के कान तो पहले ही खड़े कर दिए थे, लेकिन जब इसमें अश्लील सामग्री और पोर्नोग्राफी की पकड़ बढ़ी, तो मामला कुछ ज्यादा ही गंभीर हो गया। केंद्र सरकार के आग्रह पर गूगल और एप्पल के प्ले स्टोर से इसे भारत के लिए हटा दिया गया, यानी अब इसे भारत में डाउनलोड नहीं किया जा सकेगा। हालांकि इस पूरे विवाद को चीन में अलग तरह से देखा जा रहा है। वहां धारणा यह है कि पूरे साइबर विश्व में अमेरिकी कंपनियों ने अपना दबदबा बना लिया है और अब जब चीन की कंपनियां उन्हें चुनौती देने में सफल हो रही हैं, तो उनके लिए बाधाएं खड़ी की जा रही हैं। लेकिन यह भी सच है कि चीन की कंपनियों की साइबर गतिविधियां हमेशा से शक के दायरे में रही हैं। खुद भारत में भी यूसी ब्राउजर पर ऐसे ही कारणों से पाबंदी लगाने की बात उठी थी। आरोप था कि यह ब्राउजर उपयोगकर्ताओं के डाटा को चीन भेजता है। इससे अलग जहां तक पोर्नोग्राफी की बात है, तो वह इंटरनेट पर टिक टॉक से पहले भी थी, और उस पर पाबंदी लगाने के बाद भी पूरी तरह से खत्म होने वाली नहीं है। आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि इंटरनेट में 30 फीसदी से ज्यादा सामग्री पोर्नोग्राफी है, जबकि कुछ अध्ययनों का कहना है कि ऐसी सामग्री 50 फीसदी से भी ज्यादा हो सकती है। साइकोलॉजी टुडे  का एक अध्ययन बताता है कि दुनिया के 90 फीसदी लड़के और 60 फीसदी लड़कियां 18 साल की उम्र से पहले ही ऐसी सामग्री के संपर्क में आ जाते हैं, जो सिर्फ वयस्कों के लिए ही होनी चाहिए। इतना ही नहीं, इसमें से ज्यादातर सामग्री में महिलाओं के प्रति हिंसक व्यवहार भी दिखाया जाता है। जाहिर है, नई पीढ़ी को इस बुराई से दूर रखने का काम सिर्फ एक टिक टॉक पर पाबंदी से पूरा होने वाला नहीं है। इस समस्या को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहुत गंभीर प्रयास से ही खत्म किया जा सकता है।

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