टकराव नहीं, संवाद

  • Posted on: 27 December 2011
  • By: gaurav

 अगर सब कुछ ठीकठाक रहा तो केंद्र सरकार संसद में नया लोकपाल बिल पेश करेगी और पुराना बिल वापस ले लिया जाएगा। इसके बाद संसद के विस्तारित सत्र में 27, 28 और 29 दिसंबर को चर्चा के बाद इस बिल को पारित कराने की कोशिश की जाएगी, मगर यह साफ है कि अगर इस बिल में टीम अण्णा हजारे की मांगों के अनुरूप संशोधन न हुए तो इस बिल पर अब तक हुई सारी कवायद मिट्टी में मिल जाएगी। बिल का अधिकृत मसौदा अभी तक जारी नहीं किया गया है, मगर मीडिया के जरिए उसके जो विवरण सामने आए हैं, उन्हें टीम अण्णा ने मानने से इनकार कर दिया है और इसे जनता के साथ धोखा बताकर 27, 28 और 29 दिसंबर को अण्णा हजारे की भूख हड़ताल और फिर 30, 31 दिसंबर और 1 जनवरी को जेल भरो आंदोलन शुरू करने की घोषणा कर दी है। टीम अण्णा की सबसे बड़ी आपत्ति यह है कि केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) पर सरकार अपना नियंत्रण समाप्त करने के लिए तैयार नहीं है जबकि टीम अण्णा का तर्क है कि अगर इस जांच एजेंसी पर लोकपाल का नियंत्रण नहीं होगा तो लोकपाल नामक संस्था बनाने का कोई भी फायदा नहीं होगा। सरकार सीबीआई का अपने पक्ष में इस्तेमाल करने के लिए बदनाम है जबकि गठबंधन सरकारों के इस दौर में भ्रष्टाचार के मामलों की जांच करने वाली देश की यह सर्वोच्च एजेंसी सरकार के हाथ में अपने विरोधियों को डराने-धमकाने का एक अस्त्र मानी जाने लगी है। सीबीआई के दो भूतपूर्व निदेशकों ने सार्वजनिक रूप से इस बात की पुष्टि की है कि केंद्र में कोई भी सरकार हो, वह सीबीआई के जरिए अपने राजनीतिक हितों को साधने की पूरी कोशिश करती है। सरकारी बिल में लोकपाल के लिए प्रारंभिक जांच करने के लिए एक छोटी-मोटी एजेंसी बनाने की बात तो है मगर सीबीआई को लोकपाल के अधीन करने या उसे स्वायत्तता देने के लिए सरकार तैयार नहीं है। लोकपाल जिन मामलों की जांच का काम सीबीआई को सौंपेगा, वह उन्हीं पर निगाह रख सकता है। सीबीआई पर प्रशासनिक नियंत्रण सरकार का ही होगा। टीम अण्णा का कहना है कि ऐसा कमजोर लोकपाल कानून बनाने से तो बेहतर है कि सरकार कानून बनाए ही नहीं। सरकार ने सिटीजन चार्टर को भी लोकपाल के दायरे से बाहर रखा है और इसके लिए वह अलग से एक कानून ला रही है। सी ग्रेड के सरकारी कर्मचारियों को भी लोकपाल के दायरे से बाहर रखा गया है। यह सब देखकर टीम अण्णा ने अब पूरी तरह तलवारें खींच ली हैं। टीम के दुर्भाग्य से प्रतिपक्षी दल भी इस प्रश्न पर राजनीति कर रहे हैं और साफगोई का परिचय नहीं दे रहे हैं। ऐसे में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने लोकपाल बिल पारित कराने की प्रतिबद्धता व्यक्त करते हुए भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए और टीम अण्णा पर कड़ा प्रहार किया है। जाहिर है, प्रतिपक्ष खासकर एनडीए अण्णा हजारे की टीम के कंधे पर बंदूक रखकर सरकार को घेरने के किसी अवसर को गंवाना नहीं चाहता, जबकि टीम अण्णा सीधे-सीधे कांग्रेस और उसके नेताओं के विरोध में उतर आई है। यह टकराव किसी भी दृष्टि से देश के लिए उचित नहीं है। इसलिए अंतिम क्षणों में भी संवाद के जरिए कोई न कोई हल ढूंढ़ा जाना चाहिए। जो सरकार अंतिम क्षणों में पेंशन बिल वापस ले सकती है, रिटेल कारोबार में एफडीआई का प्रश्न टाल सकती है, वह ऐसा कमजोर बिल रखकर देश का राजनीतिक तापमान क्यों बढ़ाना चाहती है? दूसरी ओर टीम अण्णा भी तलवारें चलाने से पहले क्या एक बार फिर सभी दलों के सांसदों को समझाने के लिए कुछ समय के लिए और धैर्य नहीं दिखा सकती? खुद गांधी जी ने एकाधिक बार अपने आंदोलन मुल्तवी किए हैं?

-नवीन शर्मा

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