ऑनलाइन का पंथ

  • Posted on: 10 September 2019
  • By: admin

अगर आप फेसबुक पर हैं या ट्विटर के संदेशों को गौर से देखते हैं या फिर आपके स्मार्टफोन पर वाट्सएप के संदेश आते-जाते रहते हैं, तो आप इन जगहों पर की जाने वाली पोस्ट या भेजे जा रहे संदेशों के राजनीतिक रुझान को देखें। आप पाएंगे कि वहां आपको बहुतायत में उग्र किस्म का राष्ट्रवाद दिखेगा। हर धर्म के प्रचारक और कट्टर विरोधी भी मिलेंगे। गो-रक्षा के लिए मर-मिटने वाले भी दिखेंगे और बच्चा चोरी की बातें फैलाने वाले भी।
लेकिन वहां आपको महिलाओं और मजदूरों के अधिकारों की बात करने वाले बहुत कम दिखेंगे। कृषि संकट और किसान आत्महत्याओं की खबरें जब हर तरफ होंगी, तब भी सोशल मीडिया में इनकी चर्चा बहुत कम ही दिखेगी। किताबी भाषा में कहें, तो जिन्हें दक्षिणपंथी कहा जाता है, सोशल मीडिया पर उनकी सक्रियता सबसे ज्यादा दिखती है, जबकि वामपंथी कहलाने वाले लोग उस तरह से सक्रिय नहीं दिखते। माना जाता है कि कोई भी माध्यम आमतौर पर पंथनिरपेक्ष होता है, अगर यह सच है, तो फिर ऐसा क्या है कि एक तरह की राजनीतिक सोच सोशल मीडिया पर तेजी से फल-फूल रही है, जबकि दूसरी तरह की सोच उसकी आक्रामकता से अपना बचाव करती हुई ही दिख रही है। फ्रांस की समाजशास्त्री जेन शेरिडी ने पिछले दिनों इसका अध्ययन किया, तो काफी दिलचस्प नतीजे सामने आए। उन्होंने अपने शोध के लिए अमेरिका के नॉर्थ कैरोलिना को चुना। यह ऐसा राज्य है, जहां 2008 के चुनाव में बराक ओबामा बहुत मामूली अंतर से जीते थे और अगले चुनाव में तो इस राज्य में ठीक-ठाक अंतर से हार गए थे। शेरिडी ने पाया कि इन नतीजों में एक बड़ी भूमिका दक्षिणपंथी संगठनों की ऑनलाइन सक्रियता ने निभाई। इन संगठनों ने न सिर्फ ऑनलाइन माध्यम को गंभीरता से लिया, बल्कि बड़े पैमाने पर इसमें संसाधन भी खपाए। इतना ही नहीं, इसके लिए सांगठनिक इन्फ्रास्ट्रक्चर भी तैयार किया। वे इस सोच पर काम कर रहे थे कि परंपरागत मीडिया उनकी बातों को दबा देता है और अब उन्हें ऑनलाइन स्वतंत्रता का फायदा उठाना चाहिए। वे अपनी पोस्ट में भी इसी स्वतंत्रता की बात करते रहे और बाद में यह पाया गया कि उन्हें इसके लिए ज्यादा लाइक मिले, उनके संदेश ज्यादा फॉरवर्ड हुए, मुकाबले उनके, जो विभिन्न वर्गों के लिए अधिकार की बात कर रहे थे। हालांकि ऑनलाइन माध्यम जब आकार ले रहा था, तब अरब स्प्रिंग और ऑक्यूपाई वॉल स्ट्रीट जैसे कुछ आंदोलन इसी माध्यम से खड़े हुए थे और कुछ लोगों ने अनुमान लगाना शुरू कर दिया था कि इंटरनेट वामपंथ की वापसी का नया रास्ता तैयार करेगा। लेकिन हुआ इसका बिल्कुल उल्टा ही। यह ऐसा मुद्दा है, जिसे लेकर तुरंत  किसी नतीजे पर नहीं पहुंचा जा सकता और यह ज्यादा पड़ताल की मांग करता है। प्रिंटिंग व प्रसारण के युग में वामपंथ ने इन माध्यमों पर ठीक-ठाक पकड़ बनाई थी, हालांकि वहां भी  बाजी अंत में मध्यमार्गियों के हाथ ही रही थी। हम कह सकते हैं कि यह अभी ऑनलाइन युग का शैशव काल है, अंतत: बाजी किसके हाथ लगेगी, यह भविष्यवाणी अभी मुमकिन नहीं है।

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