अबूझ नुस्खे

  • Posted on: 10 October 2018
  • By: admin

डॉक्टरों की लिखावट, यानी हैंडराइटिंग अक्सर चुटकुलों का विषय रही है। मरीजों को तो यह परेशान करती ही है, क्योंकि वे समझ नहीं पाते कि दवा लेने की डॉक्टर की कुलजमा सलाह क्या है, यह दवा बेचने वालों और कंपाउंडरों तक को परेशान करती रही है। पिछले हफ्ते जब इसने अदालत को परेशान किया, तो डॉक्टरों को यह भारी पड़ गया। इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ के पास तीन अलग-अलग मामलों की मेडिकल रिपोर्ट आई,
तो इसे देखने के बाद अदालत के पल्ले कुछ नहीं पड़ा। दिलचस्प बात है कि ये तीनों रिपोर्ट उत्तर प्रदेश के तीन अलग-अलग जिलों से आईं। उन्नाव, सीतापुर और गोंडा के जिला अस्पतालों से आई इन रिपोर्टों पर अदालत ने कड़ा रुख अपनाते हुए डॉक्टरों पर पांच-पांच हजार रुपये का जुर्माना लगा दिया। अदालत ने डॉक्टरों के इस तर्क को नहीं माना कि काम का दबाव ज्यादा होने के कारण वे लिखावट पर ध्यान नहीं दे पाते। वैसे इस तर्क का कोई अर्थ है भी नहीं, क्योंकि खराब लिखावट डॉक्टरों की पुरानी बीमारी है। काम का दबाव कम हो या ज्यादा, इसका असर सब जगह दिखाई देता है। कई  बार इस खराब लिखावट के नतीजे बहुत खतरनाक भी हुए हैं। ऐसा ही एक दो दशक पुराना मामला टेक्सास का है। वहां एक हृदय रोग विशेषज्ञ थे रामचंद्र कोलरू। भारतीय मूल के इस डॉक्टर की वहां काफी ख्याति थी और उनकी गिनती सबसे कुशल डॉक्टरों में होती थी। उन्होंने अपने एक मरीज के लिए दवा लिखी, जिसे दुकानदार ठीक से पढ़ नहीं पाया, और मरीज को जो दवा मिली, उसने मरीज की जान ले ली। जांच हुई, तो डॉक्टर की पर्ची कई दुकानदारों को पढ़ाई गई और कोई भी ठीक से नहीं पढ़ पाया। इस मामले में अदालत ने डॉक्टर पर 4,50,000 डॉलर का जुर्माना लगाया था। उसके बाद डॉक्टरों की हैंडरार्इंटग पर दुनिया भर में बहस चली थी, पर नतीजा कुछ नहीं निकला। कई तकनीकी समाधान भी दिए गए। ऐसे पामटॉप बने, जिन पर डॉक्टर दवा पेन से भी लिखें, तो वह डिजिटल फॉर्मेट में आ जाए। लेकिन उनका उपयोग नहीं हुआ और डॉक्टर अपनी खिचड़ी लिखावट में ही लिखते रहे। आज भी यही चल रहा है। इसके कारण मेडिकल व्यवसाय दुनिया के उन कुछ पेशों में शामिल हो गया है, जिन्होंने कंप्यूटरीकरण को पूरी तरह से नहीं अपनाया। अजीब विडंबना है कि यह सब उस समय हो रहा है, जब मरीजों के परीक्षण और उनकी जांच की तकनीक तेजी से अत्याधुनिक हो रही हैं। 

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